भारतवासी क्या अपनी आने वाली पीढ़ी को नक्सली, उग्रवादी या कमजोर बनाना चाहते हैं ?…… मुफ़्तख़ोरी की पराकाष्ठा!

भारतवासी क्या अपनी आने वाली पीढ़ी को नक्सली, उग्रवादी या कमजोर बनाना चाहते हैं ?…… मुफ़्तख़ोरी की पराकाष्ठा!

आज भारत देश में अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम करने के लिए सभी राजनीतिक दलों द्वारा मुफ़्त दवा, मुफ़्त जाँच, मुफ्त बस यात्रा, मुफ्त मैट्रो रेल यात्रा, मुफ़्त राशन, मुफ़्त शिक्षा, मुफ्त विवाह, मुफ्त जमीन के पट्टे, मुफ्त मकान बनाने के पैसे, बच्चा पैदा करने पर पैसे, बच्चा पैदा नहीं (नसबंदी) करने पर पैसे, स्कूल में खाना मुफ़्त, बिजली मुफ्त, मुफ्त तीर्थ यात्रा आदि के प्रलोभन देकर सत्ता पर अपना कब्जा बनाने में लगी है।

“जन्म से मृत्यु तक सब मुफ्त” मुफ़्त बाँटने की होड़ सिर्फ और सिर्फ सत्ता हथियाने के लिए । ऐसे में देश का विकास कैसे होगा जब राजनेता और राजनीतिक दल देश की जनता का हित भुलकर अपना हित पूरा करने में लगे है ।

यह तो वहीं बात हुई – अंधी पीसे, कुत्ते खायें।

पिछले दस सालों से लेकर आगे आने वाले बीस सालों में एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो कुर्सी के पिस्सू, अस्थिर दिमाग वाले और निखथू के अलावा कुछ नहीं होंगे और इस कार्य को सम्पन्न करने में लगे हैं हमारे वह नेता और दल जो राजसत्ता पाने के लालच में घोषणा कर रहे हैं फ्री और सभी जो इनको सत्ता में काबिज करवाने में लगे हैं वह सब बनेंगे और कहलाएंगे पूर्णतया मुफ़्तखोर !

जब मां – बाप, बड़े बुजुर्ग या कोई और पारिवारिक सदस्य उनको काम करने को कहेंगे तो वो गाली दे कर कहेंगे कि सरकार क्या कर रही है?

आप सभी जानते हैं कि यह मुफ़्तखोरी की ख़ैरात कोई भी नेता / राजनीतिक दल अपनी जेब या पार्टी फ़ंड से नही देती बल्कि टैक्स दाताओं के पैसो से जो राष्ट्रहित में खर्च होने चाहिए से लुभावने वादों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करती है!

हम अपने बच्चो और आने वाली पीढ़ी को मेहनतकश सभ्य नागरिक नहीं बल्कि “परजीवी” बनाने में लगे हैं वह भी उस लालच में जो पैसा वैसे भी हमारी प्रगति के लिए ही खर्च होना है!

देश का हाडतोड़ मेहनत और अक्ल लगाकर ईमानदारी से कमाने और टैक्स भरने वाला टैक्सदाता बहुसंख्यक मुफ़्तखोर समाज को कब तक और क्यों पालेगा ?

बीस – तीस सालों बाद आर्थिक समीकरण फ़ेल हो जाएगा उस समय मुफ़्तखोर पीढ़ी का क्या होगा ? जिस ने जीवन में कभी मेहनत की रोटी नही खाई होगी, हमेशा मुफ़्तखोरी में समय बिताया होगा और उन्हे फ्री नहीं मिलने पर हम सबकी पीढ़ी नक्सली बन जाऐगी, उग्रवादी बन जाएगी या आत्महत्या कर लेगी, परन्तु काम नही कर पायेगी!

सोचने की बात है कि यह राजनीतिक दल और ऐसे नेता कैसे समाज का और देश का निर्माण कर रही हैं?

झूठा फ्री का लोभ मोह छोड़ कर गम्भीरता से चिंतन करिये, क्या हम सही रास्ते पर हैं?

जनहित में जारी
संजय बाटला

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